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शहरी सार्वजनिक स्थानों में आनंद के लिए विवाद – भाग २ II

मौलश्री मोहन द्वारा

सम्पादक की ओर से इस लेख का पहला भाग १५ मार्च २०१६ को प्रकाशित हुआ था

शहरों में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करने के नारीवादी प्रयासों में वर्ग के आधार पर विभाजन को समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि किस तरह शहरों में सार्वजनिक स्थान लगातार कम हो रहे हैं और इनके लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।

ढाबे और चाय की दुकानें अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र का भाग माने जाते हैं; दक्षिण एशिया में सरकार और बड़ी कंपनियों जैसे समृद्ध और प्रभावशाली संगठनों द्वारा व्यवस्थित तरीके से रिहाइशी इलाके बसाने की कोशिश में अक्सर इन ढाबों और चाय की दुकानों पर प्रभाव पड़ता है। कामकाजी तबके के लोग जिस तरह ज़मीन पर बस्तियों और छोटे-मोटे काम करने के लिए दुकानें बना कर बसते हैं उसे अक्सर ‘अतिक्रमण’ का नाम देकर गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाता है, ‘अतिक्रमण’ जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘हमला करना’। इन गैर-कानूनी रिहाइशी इलाकों पर अधिक कहर तब बरसता है जब नगर निगम जैसे स्थानीय सरकारी तंत्रों द्वारा इन्हें औपचारिक रूप से मंजूरी न दिए जाने के कारण इन्हें पानी, बिजली और सीवर आदि जैसे मूलभूत नागरिक सुविधाओं से वंचित रख, इनके साथ असमानता का व्यवहार दोहराया जाता है। लोगों को बार-बार उनके घरों और दुकानों आदि से यह कहकर निकाल बाहर किया जाता है कि वे निजी, सरकारी या कंपनियों की ज़मीन पर कब्ज़ा किये बैठे हैं। लेकिन जब अमीर और पैसे वाले वर्ग द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर ‘अतिक्रमण’ होता है, तब इस तरह की कार्यवाही नहीं की जाती। जैसा कि व्हाई लोइटर नामक अपनी किताब में लेखिकाओं ने उल्लेख किया है, सार्वजनिक हित के लिए सुरक्षित रखे गए ज़मीन के प्लाट अक्सर सरकार द्वारा ही बड़ी कंपनियों को दे दिए जाते हैं(87)। अमीर लोग भी सार्वजनिक सड़कों के किनारे अपनी कारों को लाइनों में खड़ी कर या अपने घरों में अवैध निर्माण कर, सार्वजनिक स्थानों पर कब्ज़ा करते हैं। स्थानीय शहरी निकायों द्वारा किये गए इन कामों को अक्सर जनसँख्या में तेज़ी से हुई बढ़ोतरी के फलस्वरूप किया गया कार्य कह दिया जाता है और जनसँख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी का आरोप भी ‘प्रवासी’ (या विशिष्ट रूप से कहें तो कामकाजी वर्ग के प्रवासी लोगों) के सर मढ़ दिया जाता है।

यहाँ आप कुछ और समझने के गलती बिलकुल न करें, व्यवस्थित तरह से लोगों को हटा देने का यह काम वर्ग की तरह ही जेंडर के आधार पर भी किया जाता है। यौन कर्मी और काम की खोज में शहरों में आई महिलाएं यहाँ की वर्ग प्रथा और अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी हैं लेकिन उन्हें भी सार्वजनिक स्थानों से दूर रखा जाता है क्योंकि उनके दिखाई देने से ‘आदर्श शहर’ की छवि धूमिल पड़ जाती है। हाल ही में वायर में एक लेख प्रकाशित हुआ कि घर पर काम करने वाली महिलाओं को, खासकर अगर वे दलित भी हों तो, किस तरह शहर में शौचालय का प्रयोग करने में कठिनाई आती है – महिलाओं के लिए बने शौचालय बहुत कम और दूर-दूर होते हैं और जहाँ होते भी हैं, वहां इनमें सफ़ाई का अभाव होता है। जिन घरों में ये महिलाएं काम करती हैं वहां उनके मालिक उनकी जाति या घर की पवित्रता के नाम पर उन्हें अपने घर का शौचालय इस्तेमाल नहीं करने देते। इन्ही बातों को आजकल स्वच्छता बनाए रखने से जुडी चिंता का नाम दिया जाता है। यौन कर्मियों को तो खासकर शहर के ‘रेड लाइट’ इलाकों में खदेड़ दिया जाता है जहाँ आवास, शहरी व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं का बहुल अभाव होता है और बार-बार पुलिस की कार्यवाही और आतंक का भी सामना करना पड़ता है। विडम्बना यह है कि यही महिलाएं सबसे अधिक सार्वजनिक स्थानों पर उपस्थित हैं; क्योंकि उनकी आजीविका ही यहाँ रहने पर निर्भर करती है। (अब सवाल यह उठ खड़ा होता है कि नारिवादी प्रयास सार्वजनिक स्थानों की इस तरह की भागीदारी में आनंद के लिए स्थान कैसे उत्पन्न करेगा?) इन्हें भी, ‘प्रवासी’ ही माना जाता है – प्रवासी करार दिए जाने का अर्थ यह हुआ कि सभी कामकाजी वर्ग के लोगों, अनौपचारिक कार्य क्षेत्र से जुड़े लोगों, घर पर काम करने वाली महिलाओं, सभी यौन कर्मियों को बाहरी व्यक्ति समझा जाता है। इसलिए शहर पर इन बाहरी व्यक्तियों का अधिकार यहाँ पहले से रह रहे (अर्थात संभ्रांत वर्ग के लोग जो खुद को ‘मूल निवासी’ कहते हैं) व्यक्तियों की तुलना में कम होता है – यह बाहरी व्यक्ति कैसे हमारे शहर में दिखाई दे कर इस शहर की छवि को खराब कर सकते हैं?

सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की मौजूदगी के लिए चलाये जा रहे अभियानों के पीछे की विचारधारा और आदर्श को समझना महत्वपूर्ण है। कामकाजी वर्ग के पुरुष सार्वजनिक बगीचों या पार्क में क्यों सोते हैं? और क्या यह सही है कि उन्हें इसके लिए कुछ नहीं कहा जाता? उनके पुरुष होने के कारण उन्हें भले ही कुछ न कहा जाता हो लेकिन उनके कामकाजी होने के कारण उन्हें शहर की सुन्दरता को ‘खराब’ करने के लिए ज़रूर कुछ न कुछ कहा जा सकता है। क्या ढाबे वाकई महिलाओं, विशेषकर संभ्रांत वर्ग की महिलाओं, के जाने की जगह नहीं हैं? या फिर ढाबे पर आने वाली महिलाओं को लोग सिर्फ इसलिए घूर-घूर कर देखते हैं क्योंकि अच्छे घर की दिखने वाली महिलाएं आमतौर पर ढाबों पर नहीं जातीं? क्या उन्हें ढाबे के किसी अलग भाग में बैठने के लिए केवल इसीलिए दिया जाता है क्योंकि हमें लगता है कि अच्छे घर की महिलाओं की इज्जत पर दाग लग सकता है? क्या होगा अगर कोई कामकाजी वर्ग की महिला किसी ढाबे में काम करने या खाना बनाने के लिए नहीं बल्कि एक प्याला चाय पीने जाए? ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने से, जहाँ आम तौर पर कामकाजी वर्ग के पुरुष और महिलाएं ही आते जाते हैं, क्या सार्वजनिक स्थानों पर सबके सामान अधिकार के बारे में कोई क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत होता है? ऐसी महिलाएं जिनके पास अपना घर और दूसरी सुविधाएं हैं, जब इन स्थानों पर पुरुषों की प्रधानता की दुहाई देते हुए हाशिये पर स्थित और लोगों की नज़रों में आने वाले स्थानों पर आना-जाना शुरू करती हैं तो क्या होता है? हम वर्ग और जेंडर के बीच के संबंधों को सिद्धान्त रूप से तो समझ लें लेकिन इन्हें ध्यान में रखकर कोई कार्ययोजना तैयार नहीं करें तो इसका क्या अर्थ होगा?

मुझे इस तरह की परियोजनायों (कृपया इस लेख का प्रथम भाग देखें)से बहुत हताशा और निराशा होती है क्योंकि इनके तहत किये गए कार्यों से सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के बारे में दो तरह के विचारों पर प्रश्न नहीं उठाए जाते और न ही उन्हें नकारे जाने की कोशिश होती है। इनमे से पहला विचार है कि कामकाजी वर्ग के पुरुष संभ्रांत वर्ग की महिलाओं के लिए खतरा हैं और दुसरे, कि आमतौर पर संभ्रांत वर्ग की महिलाओं को ही सार्वजनिक स्थानों पर जेंडर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भले ही यह भेदभाव व्यवस्थात्मक कमियों के कारण हो जैसे शौचालयों का अभाव, पीड़िता को ही दोषी ठहराना या फिर अंतर व्यक्तिक हो, जैसे पीछे से आवाज़ देकर छेड़ना, यौन आक्रमण करना आदि – वास्तव में इस तरह के जेंडर भेदभाव का सामना और इससे होने वाले आक्रोश को, अक्सर कामकाजी वर्ग की महिलायों को ही झेलना पड़ता है।

अतीत में इस तरह के कुछ प्रयासों के तहत केवल संभ्रांत वर्ग पर ध्यान दिए जाने को स्वीकार किया था। यह भी माना गया कि कामकाजी वर्ग की महिलायों को जेंडर आधारित हिंसा और भेदभाव का सामना अधिक करना पड़ता है। लेकिन साथ ही साथ उनका यह भी कहना है कि वे जानते हैं कि कामकाजी वर्ग की महिलाएं उनके इस विरोध का भाग हैं, लेकिन मात्र शामिल कर लिए जाने के नाम पर वे उनका उल्लेख नहीं कर सकते। और न ही वे यह दावा कर सकते हैं कि उन्हें इस तरह का कोई पूर्व अनुभव है। उनकी इस बात से मैं सहमत हूँ।

लेकिन, समुदायों, भेदभाव और अभियानों, इन सभी स्थानों में इस विषय पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है। इस अलावा कामकाजी वर्ग की महिलाओं या अल्पसंख्यक अभियानों का समर्थन करना भी ज़रूरी है और जिन अभियानों में इस तरह के भेदभाव और उत्पीड़न को मुख्य रूप से शामिल नहीं किया जाता है, उनका रूपांतरण करना। पितृसत्ता अन्य उत्पीड़नों से अलहदा नहीं होती है। इसलिए अलग-अलग विचारों को शामिल करने के (या उपकार करने – जैसा कि दक्षिण एशियाई नारीवादी आंदोलनों में अक्सर देखा जाता है) नज़रिए से देखने की बजाय यदि हम सभी वर्गों के सभी मुद्दों की आपसी निर्भरता को अपने अभियानों का आधार बनाएं को कैसा रहेगा? क्या हम अपनी रणनीतियों और अभियानों को इस तरह तैयार कर सकते हैं कि वे अलग-अलग तरह के भेदभावों से कामकाजी ओर अल्पसंख्यक महिलाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम कर सकें? क्या मुझ जैसी, अभावों से दूर रही महिलाएं, अपने संसाधनों, जैसे सोशल मीडिया, टेक्नोलॉजी, अंग्रेजी भाषा और खाली समय का प्रयोग कर किसी ढाबे पर जाकर बैठ सकती हैं या किसी पार्क में सुस्ता सकती हैं – ये सब इसलिए ताकि हम वास्तविकता को समझ सकें और यह चर्चा शुरू कर सकें कि किस तरह शहरों में सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग करने से महिलाएं अलग-थलग पड़ जाती हैं (क्योंकि वास्तव में ऐसा ही होता है)?

यह सही है कि सभी नारीवादी अभियानों में वर्ग और वर्ग से जुड़े उत्पीडन जैसे जाति, धर्म आदि पर एक ही तरह से विचार नहीं किया जाता। यहाँ उल्लेखनीय है कि दिल्ली में छात्र आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ अभियान, ‘पिंजरा तोड़’ हॉस्टल में रहने वाली महिला छात्राओं पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की समालोचना कर उनका विरोध करता है; इस अभियान नें अपने शुरूआती दिनों से ही इन अलग अलग भेदभावों को साथ मिला कर इनके हल खोजने की कटिबद्धता दर्शाई है। यह आन्दोलन बार-बार भारत में कामकाजी, दलित और आदिवासी महिलाओं के बारे में जागरूकता बढाने की कोशिश करता रहा है और अपने जैसे दुसरे अभियानों के साथ मिलकर चलने का प्रयास करता दिखाई पड़ता है। मुझे उनके इस अभियान का प्रभाव तब दिखाई दिया जब 16 दिसम्बर 2012 को ज्योति सिंह के सामूहिक बलात्कार मामले की वर्षगाँठ पर वे सब बसों में यात्रा के लिए गयीं। इस प्रदर्शन के कई राजनीतिक पहलु थे – एक तो यह कि ज्योति सिंह का बलात्कार और हत्या एक बस में हुई थी और दुसरे यह कि बस सार्वजनिक यातायात का एक ऐसा साधन है जिसमे दिल्ली की संभ्रांत महिलाए सफ़र करने से सबसे ज्यादा परहेज़ करती हैं और यही सार्वजनिक यातायात का वह साधन है जिसे सरकार की सबसे अधिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। मैं यहाँ सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से जुड़े ‘अच्छे’ और ‘ख़राब’ अभियानों के बीच विरोध उत्पन्न करने के लिए ऐसा नहीं कह रही, बल्कि मेरी मंशा यह बताने की है कि सभी मुद्दों को साथ जोड़कर एकसाथ उठाने का यह एक अच्छा उदाहरण है जिससे हम सीख प्राप्त कर आगे बढ़ सकते हैं।

जैसा कि Loiterव्हाई लोइटर? पुस्तक में कहा गया है कि उपभोक्तावाद को आनंद इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उपभोक्तावाद पूँजीवाद का ही रूप है और यदि जिस तरह के आनंद को अपने अधिकार के रूप में प्राप्त कर पाने की अभिलाषा महिलाओं के मन में है, वह केवल पूंजीवादी विरोधी ही हो सकती है तो उस आनंद को पाने के तरीके भी पूँजीवाद विरोधी ही होने चाहिए(पुस्तक के कंसुमिंग फेमिनिनिटी नामक पाठ में)। संभ्रांत वर्ग की जगहों पर आना-जाना ही पूंजीवाद विरोधी नहीं हो सकता अगर यह इस धारणा को मज़बूत करता हो कि किन्ही विशेष लोगों से महिलाओं को अधिक खतरा हो सकता है या फिर इन स्थानों पर आते-जाते समय उन लोगों से मेल-मिलाप न बढ़ाया जाए जो पहले से ही वहां आते हैं और जिन पर नज़र रखी जाती है। हमें यह जानना होगा कि पूंजीवाद, विरोध करने के हमारे तरीके में भी किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है।

प्रयुक्त चित्र – शाइलो शिव सुलेमान

अनुवाद – सोमेन्द्र कुमार द्वारा